पुष्कर राजस्थान के अजमेर जिले का एक छोटा सा शहर है जयपुर से 150 किलोमीटर दूर और दिल्ली से 430 किमी की दुरी पर है, पुष्कर का मंदिर भगवान् भ्रह्मा का पुरे विश्व में एकलौता मंदिर है, कहा जाता है की जब भगवान् शिव अपनी पत्नी सती की मृत्यु पर रोये थे तो उनके आंसु से दो तालाब बन गए थे जिसमे से एक पुष्कर में है और दूसरा पाकिस्तान के केतक्षा में है.

पुष्कर जाने वाले लोगो में काफी सरे विदेशी पर्यटक भी होते है, क्युकी पुष्कर एक धार्मिक स्थान है और राजस्थान में है, राजस्थान में सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक आते हैं.

हमारे अनुभव की कहानी पुष्कर से नहीं दिल्ली से शुरू होती है !

दिल्ली से निकला था जयपुर के लिए और यह सोच लिया था की आज पुष्कर पहुंचना ही है, मैंने सुबह 5:45 बजे अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की और निकल पड़ा, सुना है की रास्ते लम्बे हो तो मंजिल का मज़ा भी अलग ही होता है, मेरा पहला काम गुडगाँव को पार करना था क्युकि अगर मैं गुडगाँव में के ट्रैफिक में फस जाता तो मैं समय पर पुष्कर नहीं पहुँच पाता, इसलिए मैं घर से जल्दी निकला, और 7 बजे से पहले मैंने गुडगाँव और वहां की भीड़ को पीछे छोड़ दिया. नवम्बर के महीने में अच्छी खासी ठण्ड थी और मेरे दस्तानो का कुछ अता पता नहीं था !

सूरज निकलने लगा था और मौसम धीरे धीरे गरम हो रहा था, और पेट में चूहे भी कूदने लगे क्युकि एक आम इंसान सुबह उठते ही कम से कम चाय तो ज़रूर पीता है, रेवारी पार करते करते 8 बज गए थे और मुझे चाय की सख्त ज़रूरत थी, तभी एक छोटी सी दुकान के किनारे मैंने अपनी मोटरसाइकिल लगाई और चाय का आर्डर दिया, ठण्ड से हाथ जम रहे थे तो मैंने उसके स्टोव के पास खड़े होकर अपने हाथो को गरम किया!

चाय पीते ही ताजगी सी आ गयी और शारीर में गर्माहट आ गयी, चाय ऐसी चीज़ है जो गर्मी में ठंडा और ठंडी में गरम कर देती है!

“जब चाय होती है साथ तो बंधी रहती है आस, ज़िन्दगी भले न हो ख़ास पर कुछ तो है पास”

चाय और पेट पूजा के बाद मैं निकला सीधा जयपुर के लिए, बिना रुके चलने का सोचा पर ज़िन्दगी में अगर कुछ सोच लो तो पूरी कायनात तुम्हारी परीक्षा लेती है, पर सब परीक्षाओ को पार करके हम समय पर जयपुर पहुँच गए, जयपुर में एलेमेंट्स मॉल के पास हमारा इंतज़ार हमारे दोस्त पवन कुमार (ब्लॉगर HighwayMonks) कर रहे थे, अब समय थे उनके घर जाने का और पेट पूजा का !

Road to Ajmer (NH-8)
Road to Ajmer (NH-8)

यह सब होते होते 12 बज चुके थे और हम पुष्कर के लिए निकल चुके थे अब मैं अकेला नहीं था मेरे साथ पवन कुमार थे, जिसका मतलब था की मुझे पीछे की सीट पर आराम करना था, सुबह निकलने से पहले की रात बिना नींद के कटी थी और मुझे पीछे की सीट पर नींद आ रही थी, पुष्कर ज्यादा दूर तो नहीं है जयपुर से पर अगर पीछे बैठ के जाना पड़े तो छोटा सा रास्ता भी सैकड़ो किलोमीटर दूर लगता है.

आखिरकार 2:30 के लगभग हम पुष्कर में थे अब समय था एक कमरा लेने का और पुष्कर को जी लेने का !

एक होटल में कमरा लिया 550 रुपये में एक दिन दो लोगो के लिए, जहा हमारी मेहमान नवाजी के लिए एक प्राणी भी मौजूद था (tortoise).

अपना सामान हमने कमरे में रखा और हाथ मुह धोकर निकल गए पुष्कर की गलियों में घुमने को, काफी समय हो चला था और खाने का समय तो कबका निकल चूका था, पर वो कहते है न की भूक न मिटे तो इंसान भावुक हो जाता है, इसलिए हमने ज्यादा इंतज़ार न करते हुए पुष्कर के तालाब के किनारे जाने का फैसला किया, रास्ते में एक व्यक्ति सारंगी बजा रहा था और उसको देखने के लिए हम वही रुक गए, कैमरा निकाल कर उसकी कला को यादगार बनाने लगे, इस देश में हुनर की कमी नहीं है, कमी है उसको पहचानने वालो की, ये पहला तोफहा था पुष्कर का हमे!

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Sunset in Pushkar

वहीँ एक सनसेट रेस्टोरेंट बैठ गए और खाने का आर्डर दे मारा, सूरज ढलने लगा था और हमारे सामने खाने से भरी एक थाली थी जिसमे बोहोत कुछ था जो हमे पसंद नहीं आया !

आम आदमी तो दाल रोटी में ही खुश रहता है, तो हमने उस थाली की दाल और बाटी खा कर अपना पेट को तसल्ली दी और 300 का कूंडा करवा लिया एक थाली के लिए, और वही कहावत सच हो गयी, ऊँची दूकान फीका पकवान, पर पैसे दिए थे तो सब निपटाना भी ज़रूरी था इसलिए सबक के साथ सब चुप चाप खा गए !

पेट तो शांत हो चूका था पर पुष्कर के रंग अभी देखने बाकी थे, आँखों को सुकून मिलना बाकी था !

हम बस तालाब के किनारे बैठे थे तभी मनोरंजन का सिलसिला शुरू हुआ, एक बाबा जिनको हमने rockstar बाबा का नाम दिया उनका नृत्य देख कर अच्छे अच्छे डांसर्स शरमा जायें !

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Rockstar बाबा

अजमेर से अमन बंसल (ब्लॉगर Sportsmirchi.com)आ चूका था हमसे मिलने और हमारे साथ नजारों का लुत्फ़ उठा रहा था !

बाबा को नाचता देख कर वही बैठी एक विदेशी महिला भी उठी और नाचने लगी, अभी तो कहानी शुरू हुई थी और हमने इतना कुछ देख लिया था, हमने सब कुछ अपने कैमरे के कैद कर लिया जिससे की आप तक पहुंचा सकें!

रात तक हम यही सब करते रहे और पुष्कर की गलियों में घूमते रहे, रात हो रही थी और थकान भी होने लगी थी और अमन अपने घर की तरफ निकल चूका था, अब समय था नींद पूरी करने का क्युकी अगले दिन हमे काफी कुछ करना था !

पुष्कर में सुबह का नाश्ता

नींद पूरी कर लेने के बाद हमारा पूरा फोकस खाने पर था और सुबह उठाते ही हमे ऐसी भूक लगी जैसे जन्मो से भूखे हैं, कल की कहानी से सबक लेते हुए हमने सड़क किनारे लगे एक ठेले से पोहा खाने का सोचा, 20 रूपए में एक प्लेट पोहा खाया और 10 रूपए की चाय पी पर सिर्फ पोहे से हमारा क्या होना था हमने तो जनम ही खाने के लिए लिया था तो हमने उसी ठेले से दाल पपड़ी का भी आर्डर दे मारा, और यकीन मानिये 50 रूपए में पेट भर स्वादिष्ट खाना हमने कभी नहीं खाया था !

पोहे के बाद चने की दाल और करारी पपड़ी खाकर ऐसा लगा जैसे की स्वाद की सैलाब आ गया !

पुष्कर घाटी से शोले स्पॉट तक

अब नाश्ते के बाद पुष्कर घटी की और निकल चले थे पर रास्ता तो मालूम नहीं था तो बस चले जा रहे थे मंजिल की तरफ नहीं एक नए रास्ते की तरफ, पवन और मैंने पहले भी ऐसी हरकते की हैं की जाना कही होता है और हम कही और निकल लेते हैं, पुष्कर से पुष्कर घटी के आस पास एक कैनाल का जाल फैला हुआ है, बारिश के समय पानी को एक जगह से दूसरी जगह तक पोहचाने के लिए, और हमने उसक कैनाल में ही अपनी मोटरसाइकिल उतर दी, हमे पानी का डर नहीं था क्युकी हम राजस्थान में थे, कैनाल सूखा था पर बहार से आये हुए लोगो में से उसमे उतरने की कोशिश करने वाले हम ही पहले थे.

Pushkar ki ek Chattan par Baitha main
Pushkar ki ek Chattan par Baitha main

कैनाल में अपनी मोटरसाइकिल खड़ी करके हम एक टीले पर चढ़ गए और शोले के डायलाग बोलने लगे, वो इलाका शोले के रामगढ की चट्टानों से कम नहीं था, काफी देर तक हम वही रहे और काफी कुछ अपने कमरे में कैद कर लिया जो शायद किसी ने न किया हो आजतक, अब वापस पुष्कर और अपने होटल की तरफ जाने का टाइम था, दिन हो चूका था थोडा आराम करने का टाइम आ गया था इसलिए हम होटल लौट आये और अपने नए मित्र के साथ समय बिताने लगे !

बजट खाना संजय के ढाबे में

होटल में आराम करने के बाद हमारी गाडी एक बार फिर पुष्कर के बाज़ार की और चल पड़ी और इस बार हमे पिछले दिन जो हुआ उसको दोहराना नहीं था तो हमने एक ढाबे पर खुद को रोका ढाबे का नाम संजय ढाबा था, इस बार हमने सिर्फ दाल रोटी और चावल खाए और दाल खाकर लगा की दाल दाल होती है फिर चाहे 5 स्टार होटल बनाये या सस्ता ढाबा, दाल और पूरा खाना स्वादिष्ट था और दोनों ने 190 रूपए में अपना पेट भर लिया जहा कल हमने 300 रूपए एक थाली के दिए थे और हमे पसंद भी नहीं आई थी उसके आगे तो ये स्वर्ग का खाना था !

अब बस पुष्कर के बाज़ार की रौनक देखनी थी और सबकुछ अपने कैमेरो में कैद करलेना था, तो हम खा पी कर अपने काम में जुट गए और शाम तक पूरा पुष्कर घूम डाला, 6 बज गए थे और चाय की चुस्की का समय हो गया था पुष्कर मंदिर के बहार एक कुल्हड़ वाली चाय की दूकान दिखी, वैसे तो हम हर तरह की चाय पी लेते हैं पर कुल्हड़ वाली चाय कुछ ख़ास लगती है

Kulhad Chai (Near Temple) Highway Monks
Kulhad Chai (Near Temple)

उसमे मिटटी की खुशबु और देसीपन होता है, कुल्हड़ वाली चाय थी तो 20 रूपए की एक पर पूरा पैसा वसूल थी, अदरक और बहुत सारी इलाइची डाल कर, देर तक उबाली हुई चाय का स्वाद बिन पिए उसकी खुशबु से आ जाता है

चाय की चुस्कियो के साथ हमारी बकैती चालु थी और हम ठन्डे मौसम का आनंद ले रहे थे, अँधेरा हो चूका था बाज़ार में भीड़ बढ़ गयी थी मगर अभी और घूमना बाकी था, अभी और खाना बाकी था !

पुष्कर के मालपुए

एक जो चीज़ जो आपको बिलकुल भी नहीं मिस करनी चाहिए वो है यहाँ के मालपुए, बनाने में सरल पर स्वाद में लाजवाब, मालपुए आपको वहाँ हर हलवाई की दूकान पर मिल जायेंगे, ताज़े और गरमागरम मालपुए खा कर बस आपको लगेगा इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता और सच भी यही है!

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मालपुए पुष्कर के

जो चीज़ हमे सबसे पहले खानी चाहिए थी वो हम अपने सफ़र के अंतिम पड़ाव में खा रहे थे, पर खा तो रहे थे भूल जाते तो सबको कैसे बताते !

फालाफेल रोल देसी अंदाज़ में

विदेशी पर्यटक के हिसाब से वह की दुकाने भी बनी हुई है, आपको हिंदी अंग्रेजी के साथ दूसरी भाषाओ में भी जानकारी आसानी से मिल जाती है, फालाफेल रोल एक मिडिल ईस्ट की आइटम है जिसको खाने वालो की तादाद काफी ज्यादा है पुष्कर में 3 या 4 ऐसी दुकाने मिल जाएँगी जो यही सब बनती है, वह जाकर आप अपनी इच्छा के अनुसार अपना रोल बनवा सकते हैं जो की खाने में काफी स्वादिष्ट होता है, मैंने इस फालाफेल रोल का मज़ा लिया पवन कुमार कढ़ाई वाले दूध के लिए अपने पेट में जगह बचा कर रख रहा था पर हमे तो सबका अनुभव लेना था!

फालाफेल रोल्स ( पुष्कर बाज़ार )
फालाफेल रोल्स ( पुष्कर बाज़ार )

ये सब करते करते रात हो चली थी ठण्ड बढ़ गयी थी हम फिर से पुष्कर लेक के किनारे बैठ के दुनियादारी की बातें कर रहे थे और लेक के चारो तरफ की रौशनी का भी आनंद ले रहे थे, 9 बज गए थे बाज़ार धीरे धीरे बंद होने लगा था और अब कढ़ाई वाले दूध की बारी थी, हम फिर से उसी हलवाई की दुकान पर गए जिससे हमने मालपुए खाए थे, दूध निपटने के बाद वापस होटल जाने की बारी थी क्युकी सुबह की पहली किरन के साथ हमे वापस जयपुर के लिए निकलना था, क्युकि मुझे वापस दिल्ली भी उस्सी दिन आना था !

पुष्कर में आना आसान है पुष्कर से जाना नहीं !

Pushkar Lake
Pushkar Lake

धरम करम से ऊपर उठकर पुष्कर ने सभी तरह के लोगो को अपना लिया है यहाँ आपको किसी आम धार्मिक स्थान जैसा नहीं लगेगा, यहाँ आपको हर देश, हर राज्य के लोग मिलेंगे और सबके लिए जगह भी मिलेगी, ऐसा ही कुछ माहोल हमने ऋषिकेश में देखा था और वही रह जाने का दिल हो गया था, पुष्कर भी कुछ ऐसा ही है, जहां लोग जाते अपनी मर्ज़ी से हैं और आने का पुष्कर के हाथ में होता है, क्युकि बहार की दुनिया से ये जगह बिलकुल अलग है यहाँ आपको एक अलग ही दुनिया मिलती है इसलिए यहाँ से किसी का जाने का दिल नहीं करता !

मैं फिर आऊंगा जब कहीं और जाऊंगा कुछ किस्से कुछ कहानिया लाऊंगा !

4 COMMENTS

  1. maza agaya padhneme aur apne jo maze kiye woh padhke hum ne to diwali me kuch kia hi nahi esa laga 🙂

  2. पढके मजा आ गया निशांत साब! अब हमको भी रोड ट्रिप पे जाणे का कीड काटा है.

    जलद ही जायेंगे काही.

    धन्यवाद!

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